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“प्रशांत फाउंडेशन का उद्देश्य एक स्वस्थ एवं शिक्षित समाज की स्थापना तथा प्रकृति द्वारा दिये गये संसाधनों का सदुपयोग करके एक अच्छा वातावरण बनाना है।”

प्रशांत फाउंडेशन अंग्रेजी वर्णमाला के आठ अक्षरों  प्रशांत (PRASHANT) से बना है। ये आठ अक्षर प्रशांत फाउंडेशन  के उद्देश्यों को भली-भांति दर्शाते है। पहला अक्षर P(Peoples) लोग, दूसरा अक्षर R(Resources) संसाधन, तीसरा अक्षर A(Activity) सक्रियता, चौथा अक्षर S(Social) सामाजिक, पाँचवा अक्षर H(Health) स्वास्थ्य, छठवाँ अक्षर A(Agriculture) कृषि, सातवाँ अक्षर N(Nature)प्रकृति और अंतिम अक्षर यानी आठवाँ अक्षर T(Transparency) पारदर्शिता E(education) शिक्षा, को दर्शाता है। प्रशांत फाउंडेशन का प्रतीक चिन्ह (logo) प्रशांत फाउंडेशन के उद्देश्यों को दर्शाता है।

Prashant Foundation: Charitable Trust (NGO)( Non-Government Organization) के निम्न नेटवर्क को  एक साथ मिलाकर ही एक आदर्श समाज बना सकते है।

  • P=Peoples (लोग), R=Resource (संसाधन), A=Activity(सक्रियता), S=Social (सामाजिक), H=Health (स्वास्थ्य), A=Agriculture (कृषि), N=Nature (प्रकृति), T=Transparency (पारदर्शिता)
  • Networking (नेटवर्किंग)- Social Work ( सामाजिक कार्य), Social Welfare (सामाजिक कल्याण), Social Development (सामाजिक विकास), Social Issues ( सामाजिक मुद्दे), Education (शिक्षा), Environment (पर्यावरण), Communication (संपर्क), Financing (वित्तपोषण).

प्रशांत फाउंडेशन की स्थापना- प्रशांत फाउंडेशन के संस्थापक डॉ० रिपुदमन सिंह है, जो सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ से  (B.Sc.-Ag.) Bachelor Of Science (Agriculture) –  Honours एवं चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर से (M.Sc.- Agronomy) Master Of Science (Agronomy), एवं (Ph.D.- Agronomy) Doctor of Philosophy) की उपाधि ली है। वैसे हम सभी लोग समाज सेवा करना चाहते है लेकिन जीवन की परेशानियों में समाज सेवा के संकल्प को भूल जाते है। डॉ० रिपुदमन सिंह ने भी अब तक के जीवन काल में अनेको उतार-चढ़ाव देखे है। किंतु उन्होंने अपने शुरुआत के दिनों में देखे समाज सेवा के सपने को नही भूले , और जब उन्हें समाज सेवा का अवसर मिला तो वो इसको बड़ी ही उत्सुकता से निभा रहे हैं। डॉ० रिपुदमन सिंह सदैव समाज में शोषित और पिछड़ों के उत्थान की बात करते है उनका यह विचार है कि जिस तरह प्रकृति में विद्यमान हर चीज दूसरो के ही काम आती है (जैसे पानी किसी प्यासे की प्यास बुझाता है, पेड़-पौधे फल व अन्न उपजते है जिससे सभी जीव पोषित होते है आदि।) उसी प्रकार उनका ये जीवन भी दुसरे लोगो को समर्पित होना चाइये। डॉ० रिपुदमन सिंह अपने इस सकारात्मक जीवन रुपी सोच को समाज में जरूरतमंद लोगो की सहायता करके , अपनी सोच को सच साबित कर रहे है।

जिस प्रकार कबीर द्वारा कथित वचन-

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,

तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

 अर्थात् – इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है। यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं
लगता।

वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर । 
परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर ॥

अर्थात् – वृक्ष कभी अपने फल नही खाते और नाही नदी कभी अपना जल संचित करती है लोक कल्याण के हेतु बहती रहती है वैसे ही एक सच्चा मनुष्य भी अपने सुख दुःख कष्टो की चिंता न करके औरो के लिए अपने शरीर, मन, आत्मा से कल्याण का भाव रखे। वही सच्चा मनुष्य है।